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भेदभाव क्यों!

 


भेदभाव क्यों!


की एंड का इन दो शब्द का अर्थ मुझे कभी समझ ने की जरूरत नहीं पड़ी मेरे आस-पास के लोग समाज ने मुझे बचपन से ही सिखाया है।

मैं आपको एक संडे की शाम की कहानी सुनाता हूं। छुट्टी का दिन था पापा ने अपने एक दोस्त को घर पर निमंत्रण किया था। मेरी माँ सुबह से ही मेहमानों के आने की तैयारी कर रही थी। पापा बैठकर टीवी देख रहे थे। मेरी दीदी का इम्तिहान था इस वजह से वह अपने कमरे में पढ़ाई कर रही थी और किसी को डिस्टर्ब ना करने के लिए कहा था। मैं माँ के साथ रसोई में उनका हाथ बढ़ाने गया। तभी डोरबेल की घंटी बजती है और पापा दरवाजा खोलने के लिए उठते हैं। पापा की आवाज मेरे कानों तक पहुंचती है 'अरे! नमस्ते भाई साहब आइए-आइए भाभी जी आप भी आइए स्वागत है आपका। बड़े दिनों बाद मिले हैं।' पापा अपने दोस्त और उनकी बीवी से कहते हैं।
उनके दोस्त उनसे कहते हैं 'हाँ भाई साहब लॉकडाउन की वजह से और यह कोरोना इसकी वजह से तो घर से निकलना ही बंद हो गया है।'
इतना कहकर वह दोनों घर में प्रवेश कर जाते हैं और आंटी पापा से कहती है 'भाभी कहां है?' पापा कहते हैं 'वो रसोई में है।'
इतना सुनकर वह भी रसोई की ओर आ जाती है और मुझे काम करता हुआ देख अपनी शक्ल टेढ़ी-मेढ़ी करने लगती है।
मेरी माँ से कहती है 'अरे! भाभी कैसी हैं आप? बच्चों को साथ नहीं लाई?'
उन्होंने बड़े गुरुर से मेरी माँ को जवाब दीया 'मैं ठीक हूं भाभी। और बच्चे! बेटा तो कोचिंग गया हुआ पूरा दिन पढ़ाई करता रहता है। मेरी बेटी वह घर पर है। वैसे भाभी आकाश रसोई में क्या कर रहा है?'
मेरी माँ ने उनसे कहा 'आकाश तो मेरा हाथ बटा रहा है। आकाश ने तो खाना बनाना भी सीख लिया है।'
'अरे! भाभी खाना! पढ़ाई नहीं करता क्या?' आंटी ने अचंभे में कहा।
माँ ने हंसकर जवाब दिया 'पढ़ाई हाँ पढ़ाई तो करता है। पढ़ाई में तो बहुत होशियार है। साथ ही साथ उसे खाना बनाने में भी दिलचस्पी है। यूट्यूब से नई-नई रेसिपी देखकर बनाने की कोशिश करता रहता है। हमें तो हर वीकेंड कुछ नया खाने को मिलता है।'
'लेकिन भाभी जी वह कि नहीं है वह का है!' आंटी ने कहा।
माँ ने मेरी तरफ देखा और मुझे इशारे से वहां से जाने के लिए कहा। मैं बिना कुछ कहे वहां से निकल आया और दरवाजे के बाहर खड़ा होकर उनकी बातें सुनने लगा।
मेरी माँ ने उनसे कहा 'क्या फर्क पड़ता है भाभी की हो या का? रसोई का काम तो की और का दोनों को भी आना चाहिए।'
'अब भाभी अगर आपको कोई दिक्कत नहीं है तो इसमें मैं कुछ नहीं बोल सकती लेकिन का अगर बाहर का काम का देखें तो ही जचता है और घर संभालने के लिए खाना बनाने के लिए की तो है ही ना।' आंटी ने बड़े गुमान से माँ को जवाब दिया।
'हाँ भाभी आप सही बोल रही हो लेकिन हर किसी की अपनी एक पसंद-नापसंद होती है। अगर का को खाना बनाने में दिलचस्पी है तो इसमें कुछ गलत नहीं है और अगर कि घर के बाहर का काम देखें तो इसमें भी कुछ गलत नहीं है। मैंने अपने दोनों बच्चों में की और का वाला भेदभाव नहीं किया। मैंने दोनों को बराबर समझा है हमेशा दोनों से ही बराबर काम करवाया है। आकाश को डस्टिंग करना मॉपिंग करना खाना बनाना बर्तन धोना यह सारी चीजें मैंने सिखाई है। और आकाश को यह काम करने में शर्म नहीं आती उसको अच्छा लगता है। और रही बात मेरी बेटी ज्योति की तो उसे इन सब कामों में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैंने कभी उस पर कोई दबाव भी नहीं डाला यह सब काम करने में और पढ़ाई में बहुत होशियार हैं और वह हमेशा अपनी किताबों के साथ ही व्यस्त रहती हैं। उसे पढ़ना अच्छा लगता है। आपको तो यपता ही होगा मैट्रिक में पूरे स्टेट में फर्स्ट आई थी वह सिर्फ 0.24 कम थे 100% मैं।'
'भाभी आपके बच्चे हैं। आप उन्हें जैसी परवरिश देना चाहती ही दे सकती है। मेरा काम है आपको सचेत करना वही कर रही थी। इसमें की ओर का वाला भेदभाव कैसा मेरे भी तो दो बच्चे हैं मैं भी उनमें  भेदभाव नहीं करती लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि लड़के को मंगलसूत्र पहना कर घर बैठा दो और लड़की के हाथ में ऑफिस की फाइलें थमा दो।' आंटी ने गुस्से में कहा
माँ ने हंसकर कहा 'अरे! भाभी मैंने ऐसा कब कहा मेरा कहना सिर्फ इतना है कि की और का वाला भेदभाव कितने दिन और चलेगा इसे हमें ही तो खत्म करना होगा ना। आज हमारे हस्बैंड अगर घर का थोड़ा काम जानते तो हमारी थोड़ी मदद कर देते। हमें भी बीच में अपना काम छोड़ा नहीं पड़ता। आज हम भी अपना काम जारी रख सकते थे। आप बताइए भाभी मैंने कुछ गलत कहा?'
आंटी खामोश थी।
'की हो या का घर की जिम्मेदारी तो दोनों की एक समान होती है। अगर घर में दो लोग हैं तो एक को घर का तो दूसरे के बाहर का काम देखना होगा ना चाहे वह कि हो या का।' माँ ने आंटी को विनम्रता के साथ कहाँ।
तभी पापा ने माँ को आवाज लगाई 'अरे! रसोई में ही रहोगी या नाश्ता भी परोस होगी।'
माँ ने तुरंत जवाब दिया 'हाँ लाई! चलिए भाभी बाहर बैठते हैं।' कहकर वह दोनों वहां से चले गए। आंटी सोफे पर जाकर बैठ गई और माँ सबको नाश्ता परोसने लगी। और सब अपनी अपनी बातों में लग गए।

मेरी माँ ज्यादा पढ़ी-लिखी नही है। मुझे हमेशा लगता था कि उनकी सोच मॉडर्न नहीं है ओपन माइंडेड नहीं है हम उनसे कुछ शेयर करेंगे तो हमें नहीं समझेंगी । लेकिन आज उन्होंने यह बातें कह कर मेरी सोच ही बदल दी। इंसान की सोच स्कूल जाने से ही मॉडल नहीं होती। वास्तव में ओपन माइंडेड अपने आसपास के लोगों को देखकर अपनी नई पीढ़ी को देखकर उनके साथ एडजस्ट करके उनकी भावनाओं को समझ कर बनना पड़ता है। जैसे मेरी माँ की और का मैं भेदभाव नहीं करती है। समाज में भी की और का का भेदभाव नहीं होना चाहिए। की हो या का दोनों बराबर होते हैं जिम्मेदारी दोनों की बराबर होती है। घर हो या बाहर कि और का दोनों में सक्षम होते हैं। फिर यह भेदभाव कैसे?

निष्कर्ष

की एंड का सब एक समान क्या ऐसे सच में है क्या?

आज भी हमारा समाज पिछड़ा हुआ है। जब बात की और का की आती है तो। हमने तो की और का को रंगों में भी बांट दिया है का हुआ है तो ब्लू, की हुई है तो पिंक। कर्म क्षेत्र में भी हमने दोनों के काम को बांट दिया है। जब बात घर की ज़िम्मेदारी की आती है तो की का नाम पहले आता है का भी तो घर में रहता है क्या घर का काम उसकी जिम्मेदारी नहीं? क्यों कि और का एक दूसरे का काम नहीं कर सकते? क्यों वह अपना काम नहीं बांट सकते? अगर का की का काम कर दे तो वह जोरू का गुलाम कहलाने लगता है।

अगर की का से ज्यादा कमाए तो समाज का इगो हर्ट हो जाता है। कि का प्रमोशन का से जल्दी हो जाता है तो। कि अपने बॉस को इंप्रेस करने के लिए अलग-अलग तरकीबें आजमाती है। न जाने क्या-क्या कमेंट करता है समाज उसके चरित्र पर। कोई की की काबिलियत को नहीं देखता।

की और का एक समान यह सिर्फ कहने की ही बात है। आज भी लोग का को घर के चिराग से संबोधित करते हैं! और की को पराया धन कहकर संबोधित किया जाता है! ऐसा कब तक चलेगा। हमारा समाज कब आगे बढ़ेगा? कब की और का को समान अधिकार मिलेगा?

पहल हमारे घर से ही करनी है हमें तभी समाज में परिवर्तन आएगा।





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