Skip to main content

बस स्टॉप वाला मेरा मासूम प्यार...

 बस स्टॉप वाला मेरा मासूम प्यार...



2 मई शाम 5:00 बजे का समय धूप अब दोपहर के मुकाबले कम थी लेकिन गरम हवा ने मेरी जान ले रखी थी और उसी के साथ ऑफिस के हजारों कॉल्स। एक कॉल खत्म करी तो दूसरा कॉल आना शुरू। फोन की रिंग से में इरिटेट हो गई। उस कॉल को डिस्कनेक्ट करके मैंने अपना फोन जैसे तैसे अपने टोट बेग में रखा और और रोड क्रॉस कर के बस स्टॉप पर जाने लगी। बस का समय 5:15 का था। ऑफिस से निकलते और रोड क्रॉस करते-करते मुझे 5:15 पहले ही हो गए थे। मेरी नजर कभी अपने हाथ में पहनी घड़ी की तरफ जाती तो कभी मेरे सामने से गुजरती गाड़ियों की तरफ। रोड क्रॉस करके जैसे ही मैं बस स्टॉप पर पहुंची तो मुझे पता चला कि बस 10 मिनट देर से आएगी। जीसे सुनकर मुझे एक तरफ राहत हुई कि 'मैं लेट नहीं हुई।" लेकिन दूसरी तरफ मुझे मौसम का हाल देखकर खुद पर तरस आया कि अब मुझे 10 मिनट और यहां खड़ा होना होगा।

मैं बस का इंतजार करते बार-बार मेरी नजर अपनी घड़ी पर पड़ती और मैं बस को कोसने लगती की आज ही इसे देर से आना था। मेरी बस लेट होने के कारण दूसरी बस का शेड्यूल करीब आ गया और उस बस के लोग भी अब आकर बस स्टॉप पर वेट करने लगे। पहले के मुकाबले भीड़ आब ज्यादा थी वहां एक छोटे बच्चा अपने माता-पिता के साथ, एक बुजुर्ग महिला थी जो मुझे देखकर बार-बार मुस्कुराती, एक युवक खड़ा था जो अपने फोन पर कुछ कर रहा था। गर्म हवा मेरे चेहरे से टकराती और मैं फिर अपनी नजर अपने हाथ में पहनी घड़ी की तरफ देखती। इतने में मेरे फोन की घंटी फिर से बजती है और मैं अपने बैग से फोन निकालने को होती हूं। मेरे बैग में इतना सारा सामान होने की वजह से मुझे अपना फोन ढूंढने में बड़ी मुश्किल हो रही थी। जैसे ही मेरे हाथ में फोन आता है। वही बैग मैं राखी मेरी छोटी डायरी जमीन पर गिर जाती। एक हाथ से मैंने अपना फोन रिसीव करा और मैं झुककर वह डायरी उठने लगी।

फोन रिसीव कर के मैंने अपने कान से लगाया था और मेरी नजर जमीन से ऊपर की तरफ उठी तो मैरे सामने एक नौजवान खड़ा था। उसने ब्लू शर्ट और ब्लैक पेंट पहनी थी कंधे पर बैकपैक था। वह किसी से फोन पर बात करते हुए अपने हाथ को बार-बार हिला रहा था। जैसे वह हाथ के इशारे से उसे अपनी समझाना चाहता हो हालांकि वह फोन पर था। बात करते हुए उसके चेहरे पर 1 मिनट में हजारों भाव उभर रहे थे। कभी वह खिल खिलाकर मुस्कुराता, कभी उसके माथे पर चिंता की लकीरें आ जाती, कभी वह धीरे से मुस्कुराता, कभी वह अपने हाथों से अपने सर पर थपकी देता। उसे देखते-देखते में अपनी डायरी लेकर सीधी खड़ी हुई। वह मुझे करीब चार हाथ की दूरी पर था। उसका चेहरा दूसरी तरफ था मैं उसकी साइड प्रोफाइल ही देख पा रही थी। मेरी डायरी बैग में रखते हुए मैंने उसकी आंखों की तरफ देखा बड़ी गोल-गोल आंखें नीली और काली उसकी आंखों को देखकर लगा कि उसका नाम सागर होना चाहिए। जब भी उसके चेहरे पर भाव बदलते उसकी आंखें छोटी बड़ी होने लगती। रंग सफेद, लंबा, घुंघराले बाल पतली-पतली उंगलियां जिससे वह अपना फोन पड़े हुए था। हाथ में एक रिस्ट वॉच जो उसकी पूरी लुक को कंप्लीट कर रहा था। उम्र कभी करीब 30 रही होगी उसकी।

उसे देखकर मुझे उससे बात करने की इच्छा हुई लेकिन उसका तवज्जो मेरी तरफ नहीं था वह अपने फोन पर ही व्यस्त था। उसे देखते हुए मुझे करीब 5 मिनट बीत गए अब मुझे वह गर्म हवा गर्म नहीं लग रही थी और ना अब मैं बस के जल्दी आने का वेट कर रही थी। मन हो रहा था पूरी जिंदगी वह वहीं खड़ा रहे और मैं उससे बस ऐसे ही तख्ती रही। उसके मोती जैसे आंखों की तरफ देखते हुए मैंने अपने हाथ में पड़े फोन की तरफ ध्यान दिया तो पाया फोन अभी भी चालू था क्योंकि मैंने फोन रिसीव किया था और अभी तक कोई बात नहीं करी। इस बात से बेखबर की फोन की दूसरी तरफ अभी भी कोई व्यक्ति हेलो...हेलो... कर रहा है मैंने फोन को डिस्कनेक्ट किया और अपने फोन से उसकी तस्वीर लेने की कोशिश करी। भीड़ ज्यादा होने के कारण उसकी तस्वीर ले पाना काफी मुश्किल हो गया और जैसे ही मैंने अपना फोन कैमरा उसकी तरफ करा उसकी नजर मुझ पर पड़ी और वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। उसकी उस एक मुस्कुराहट में मानो मेरा दिल उसे दे दिया। उसकी मुस्कान देख मैं उसकी आंखों में खो गई। अब वह फिर से फोन पर बात करने लगा। इस बार मैंने उसकी तरफ पीठ कर के सेल्फी लेने के बहाने से उसकी तस्वीर क्लिक करने का सोचा जैसे ही मैंने अपना हाथ तस्वीर लेने को उठाया उसकी बस T11 वहां आकर खड़ी हो गई और वह वहां से चला गया बिना पीछे पालते। मैंने अपना कैमरा बंद करा और पीछे पलट कर देखा तब तक वह भीड़ में गुम हो चुका था कही। जैसे ही उसकी बस वहां से गई मेरी बस भी आ गई और मैं अपने बस में बैठकर अपने घर आ गई। लेकिन मेरा दिमाग उसी T11 बस में था। अगले दिन में 5:00 बजे जाकर वहां खड़ी हो गई लेकिन वह वहां नहीं था। ऐसा मैंने एक हफ्ते तक किया लेकिन वह वहां आया ही नहीं। फिर एक दिन बेसब्र होकर मैं T11 बस मै चढ़ी और उसे तलाश करने लगी। मैंने काफी सारे लोग जो उस बस से रोज आना जाते थे उनसे भी उसके बारे में जिक्र किया लेकिन किसी को उसके बारे में कुछ नहीं पता। मैं अभी भी उसे ढूंढ रही हूं उसी बस स्टॉप पर उसी T11 बस में लेकिन वह मुझे वहां नहीं मिला। और वह मेरा मासूम पहली नजर का प्यार मेरे दिल में ही दफन रह गया। मैं आज भी बस यहीसोच रही हूं कि तुम्हारा नाम क्या होगा? तुम्हारा पता क्या होगा? तुम कि बस में सफर कर रहे होगे?

T11 बस में अगर आप में से किसी को ऐसा इंसान दिखे तो मुझे बताइएगा

Comments

Popular posts from this blog

WHO AM I ?

  क्या है मेरी पहचान ?  ह र सुबह की तरह ही आज की सुबह की शुरुआत हुई। किसी को स्कूल जाने की जल्दी थी! तो किसी को ऑफिस जाने की जल्दी थी! और मुझे उन लोगों को वक्त पर भेजने की जल्दी थी। मैंने अपने पति को नाश्ता दिया और उनसे कहा "क्या आप मुझे मेरी माँ के घर छोड़ दोंगे?"  उन्होंने कहा "ठीक है! तुम्हें छोड़ दूंगा लेकिन जल्दी करो मुझे देर हो रही है।"  "मैं तैयार ही हूँ !" इतना कहकर मैं कमरे में गई और सूटकेस लेकर आ गई।  उन्होंने जैसे ही मेरा सूटकेस देखा उसने कहा "कितने दिन के लिए जा रही हो? मुझे लगा कि तुम केवल आज के दिन के लिए ही जा रही हो!" "कुछ दिन वहां रखूंगी लेकिन जल्दी आ जाऊंगी।" मैंने कहा "लेकिन बच्चों का स्कूल?" उसने कहा  "उनकी कुछ दिनों के की छुट्टी है। आप फिक्र ना करें उनकी पढ़ाई का कोई नुकसान नहीं होगा।" इतना कहकर मैं उनकी तरफ देखने लगी "अरे! नहीं तुम जाओ मेरा कहने का वह मतलब नहीं था ठीक है चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।" इतना कहकर उन्होंने अपना नाश्ता किया और मुझे मेरी माँ के घर तक छोड़ दिया और वह ऑफिस क...

अननोन नंबर

"कहानी तो सब की ही होती है लेकिन हमारी कहानी अधूरी होकर भी मुकम्मल है।" सु बह के 9:00 बज रहे थे। माँ ने कमरे में आते ही पंखा बंद किया और सारे परदे खोल दिए 'माँ थोड़ी देर और सोने दो।' कहकर फिर से करवट बदल कर सो गई मैं। उसी वक्त फोन की घंटी बजती है। आंखें खुल नहीं रही थी लेकिन जैसे तैसे आंखों को मसल कर फोन की स्क्रीन पर वह अननोन नंबर देखा। मुझे नहीं पता था वह अननोन नंबर मेरी जिंदगी बदलने वाला था। पहले मुझे लगा कि किसी डिलीवरी बॉय का होगा क्योंकि कुछ सामान मैंने ऑनलाइन आर्डर कर रखे थे जिनकी डिलीवरी आज ही होनी थी जैसे ही मैंने फोन रिसीव किया सामने से एक पुरुष की कठोर आवाज मुझे सुनाई आती है मेंरे 'हेलो' कहने से पहले ही वह मुझसे कहता है 'तुम अभी तक पहुंचे क्यों नहीं?' मैं थोड़ा सोचती हूं कि ''मैंने कहां पहुंचने का वादा किया था किसी को!'' फिर में उनसे पूछती हूं कि 'आप कौन बोल रहे हैं?' उनकी आवाज में तुरंत परिवर्तन आ गया। नम आवाज में उन्होंने मुझसे पूछा 'क्या यह रमेश का नंबर है?' मैंने उनसे गुस्से में कहा कि 'जी नहीं!'...