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WHO AM I ?

 क्या है मेरी पहचान ? 


र सुबह की तरह ही आज की सुबह की शुरुआत हुई। किसी को स्कूल जाने की जल्दी थी! तो किसी को ऑफिस जाने की जल्दी थी! और मुझे उन लोगों को वक्त पर भेजने की जल्दी थी। मैंने अपने पति को नाश्ता दिया और उनसे कहा "क्या आप मुझे मेरी माँ के घर छोड़ दोंगे?" 


उन्होंने कहा "ठीक है! तुम्हें छोड़ दूंगा लेकिन जल्दी करो मुझे देर हो रही है।" 


"मैं तैयार ही हूँ !" इतना कहकर मैं कमरे में गई और सूटकेस लेकर आ गई। 

उन्होंने जैसे ही मेरा सूटकेस देखा उसने कहा "कितने दिन के लिए जा रही हो? मुझे लगा कि तुम केवल आज के दिन के लिए ही जा रही हो!"


"कुछ दिन वहां रखूंगी लेकिन जल्दी आ जाऊंगी।" मैंने कहा

"लेकिन बच्चों का स्कूल?" उसने कहा 

"उनकी कुछ दिनों के की छुट्टी है। आप फिक्र ना करें उनकी पढ़ाई का कोई नुकसान नहीं होगा।" इतना कहकर मैं उनकी तरफ देखने लगी

"अरे! नहीं तुम जाओ मेरा कहने का वह मतलब नहीं था ठीक है चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।" इतना कहकर उन्होंने अपना नाश्ता किया और मुझे मेरी माँ के घर तक छोड़ दिया और वह ऑफिस के लिए निकल गए। 


मुझे मेरी माँ के घर जाने का मौका कम ही मिलता था क्योंकि घर की जिम्मेदारियों के चलते और बच्चों के साथ वक्त नहीं मिल पाता था। इसीलिए एक ही शहर में रहते हुए भी मैं साल में केवल एक या दो बार जाया करती थी वहा। मैंने माँ को मेरे आने की सूचना पहले से ही दे दी थी। माँ ने मेरे लिए बहुत से स्वादिष्ट पकवान बनाए हुए थे जिसमें से मेरी पसंदीदा शाही पनीर और रबड़ी भी शामिल थी। मेरी माँ के हाथ का खाना सबसे स्वादिष्ट है। केवल मेरी नहीं सभी के लिए ही अपनी माँ का बनाया हुआ खाना सबसे ज्यादा स्वादिष्ट होता है। दोपहर को खाना खाने के बाद हम सब थोड़ी देर आराम करने के लिए चले गए। 


शाम का वक्त हो गया था... 


उसी शाम माँ कि कुछ सहेलियां घर पर आईं। मेरी माँ ने उन्हें चाय नाश्ता परोसा वे लोग मुझसे बातें करने लगे। उनमें से एक ने मुझसे पूछा "तुम तो इसी शहर में रहती हो फिर मैं इतनें दिन बाद क्यों आती हो घर और हमारे घर का रास्ता तो जैसे भूल ही गई हो।"


मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया "अरे! नहीं आंटी ऐसी कोई बात नहीं है बस कामों में थोड़ी बिजी रहती हूं।"

उन्होंने कहा "तुम तो कोई जॉब भी नहीं करती हो ना फिर भी तुम्हें घर के कामों में इतना वक्त लग जाता है कि माँ के घर आने का वक्त नहीं मिलता। और मायके में कितने दिन रुकने का इरादा है और वापस ससुराल कब जा रही हो।" 


यह बात सुनकर मुझे थोड़ा बुरा लगा मैंने धीमी सी आवाज में उनसे कहा "आंटी कुछ ही दिनों में चली जाऊंगी। आप नाश्ता कीजिए मैं बच्चों को देख कर आती हूं।" इतना कहकर मैं बच्चों के कमरे में आ गई और वे लोग थोड़ी देर में चले गए। 


मैं वहां 2 दिन रुकी और अपने ससुराल वापस आ गई। 2 महीने बीत चुके थे मुझे वहां से आए हुए। मेरी सास की बहन उनसे मिलने घर आई थी। उन्होंने मुझसे कहा "अरे! रिशमी बेटा कैसी हो?"

मैं उनसे कहती हूं "हाँ मौसी जी मैं ठीक हूं। आप कैसी है? घर पर सब ठीक है?" 

वे कहती हैं "हाँ बेटा सब ठीक है। यही से गुजर रही थी तो सोचा तुम लोगों से भी मिलती जाऊं। तुम बताओ अपने मायके कब गई थी तुमऔर घर पर सब ठीक है। "


"हाँ मौसी जी कुछ दिन पहले ही वहां से होकर आई हूं।" मैंने उनसे कहा

"अच्छा बेटा ठीक है तुम अपना काम कर लो! मैं बाद में बात करती हूं तुमसे।" इतना कहकर वह मेरी सांस के कमरे में चली गई। मासी जी कुछ देर में अपने घर चली गई। 


रात का वक्त हो रहा था। मैं सोने की कोशिश कर रही थी लेकिन मुझे नींद नहीं बार-बार करवट बदल रही थी। यह सब देख कर मुझसे मेरे पति ने चिंता जताते हुए पूछा  " क्या हुआ इतना बेचैन क्यों नजर आ रही हो? तबीयत तो ठीक है तुम्हारी।" 


"नहीं मैं ठीक हूं बस कुछ सोच रही थी!" मैंने कहा 

"अच्छा क्या सोच रही हो?" बड़ी उत्सुकता से उन्होंने पूछा


"यही कि जब मैं यहां रहती हूं तो मुझसे सब पूछते हैं मायके कब जाओगी? जब मायके में रहती हूं सब कुछ तो है ससुराल कब जाओगी? क्या यह दोनों घर मेरे नहीं है?" मैंने कहा 

"अरे! तुम ऐसा क्यों सोच रही हो! यह दोनों घर ही तुम्हारे हैं। लोगों का क्या है। लोगों की बातों पर क्यों ध्यान दे रही हो वह तो कुछ भी कहते हैं!" उन्होंने कहा 


"यह बात नहीं है बस मैं यह सोच रही थी कि जिस घर में मैं इतने साल रही हूं उस घर में मुझे दिन गिन के रहना पड़ता है! और वहां पर जाते से ही दिन गिरना शुरू हो जाते हैं।


कोई भी मिलने आता है तो पहले यह नहीं पूछता है के 'कैसी हो?' यह पूछता है कि 'कब आई हो? कितने दिन रुकोगी?' और यहां रहती हूं तो 'सब पूछते हैं मायके कब जाओगी?'..." मैंने अपनी बात खतम नहीं की थी उन्होंने मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा "अरे! तम इतना क्यू सोच रही हो इस चीज को लेकर क्या फर्क पड़ता है दोनों तुम्हारे ही तो घर है तुम जितने दिन चाहो वहां भी रुक सकती है और यह तो तुम्हारा अपना घर है।"


"हाँ यह मेरा अपना घर है मुझे मालूम है वह घर भी मेरा अपना है मुझे आप बताइए आप यहां रहते हो तो आप से कोई पूछता है आप कितने दिन रुकोगे या वहां कब जाओगे?" 

उन्होंने धीरे से अपना सर हिलाया और कहां "नहीं!"


मैंने उनसे कहा "यही तो बात है ना! यह घर मेरा ससुराल! वह घर मेरा मायका! इन दोनों घरों में से मेरा खुद का घर कौन सा है? जहां मुझसे कोई यह ना पूछे कि तुम कितने दिन रुकोगी! या वहां कब जाओगी! आप समझ रहे हैं मैं क्या बोल रही हूं।"


वे खामोश थे उन्होंने कुछ नहीं कहा

मैंने फिर कहा "किसी की बेटी, किसी की बहन, किसी की पोती, किसी की बीवी, किसी की बहू, किसी की माँ, न जाने कितने रिश्ते निभाते-निभाते मैं खुद की पहचान ही भूल गई!" यह कहते हुए मेरी आंखों में पानी आ गया


यह सब देखकर उन्होंने मुझसे पूछा "क्या तुम्हें इस चीज का अफसोस है?"


खुद को संभालते हुए भरी आवाज में मैंने कहा "नहीं मुझे इसका अफसोस नहीं है। जब मैं सबको खुश देखती हूं तो मुझे अच्छा महसूस होता है। लेकिन जब मैं अकेले में यह बात सोचती हूं कि मेरा क्या अस्तित्व है? मैं कौन हूं? मैं क्या कर रही हूं? तब कहीं ना कहीं मुझसे बुरा लगता है मुझे तकलीफ होती है।"


"तुम चाहो तो अपना काम शुरू कर सकती है बच्चों को मैं भी संभाल सकता हूं।" उन्होंने मेरी तरफ देख कर कहा


मैंने मुस्कुरा कर उनकी तरफ देखा और उनसे कहा "मैं आप से कोई शिकायत नहीं कर रही हूं। केवल अपने दिल का हाल बता रही हूं। कहीं ना कहीं दुनिया की हर औरत को कभी ना कभी ऐसा महसूस हुआ होगा अपने खुद को लेकर 'मैं कौन हूं?' हम औरतें अपने परिवार और अपनी जिम्मेदारियों में इतना ज्यादा खो जाते हैं कि अपने लिए हम समय नहीं निकलते ना हम कोशिश करते हैं अपने लिए कुछ करने का। लेकिन यह तो गलत है ना जब तक हम खुद खुश नहीं होंगे तब तक हम दूसरों को कैसे खुश रखेंगे? दूसरों के लिए जीते-जीते एक दिन हमारी जिंदगी खत्म हो जाएगी। ना हम अपना तीसरा घर तलाश कर पाएंगे ना हम यह तलाश कर पाएंगे कि हम कौन हैं?"


"अरे...अरे...अरे...! इतनी रात को कैसी बातें कर रही हो चलो ठीक है। सारे पति अपनी पत्नि की भावनाएं नहीं समझ पाते लेकिन मैं तो समझता हूं ना" उन्होंने मुस्कुरा कर कहा

उनकी यह बात सुनकर मैंने भी मुस्कुरा दिया और उनसे कहा "अच्छा जी कैसे?"


उन्होंने कहा "ठीक है हम एक काम कर सकते हैं। ऑफिस के दिनों में तो नहीं हो पाएगा लेकिन हर वीकेंड पर पूरा दिन बच्चों को और घर को मैं संभाल लूंगा और तुम अपना दूसरा घर तलाशें करना खुद को तलाशना! वैसे तो मैं तुम्हें रोज तुम्हारे कामों से तुम्हें छुट्टी दे सकता हूं लेकिन फिर ऑफिस में बॉस मेरी छुट्टी कर देंगे।"

मैं जोर से हंस पड़ी और उनसे कहा "अच्छा चलो अब सो जाओ बहुत रात हो गई है। कल फिर जल्दी उठना भी है।"


"हाँ लेकिन हर वीकेंड पर तुम्हारी छुट्टी!" इतना कहकर सोने चले गए। कुछ देर में मेरी भी आंख लग गई.... 


क्या सिर्फ 1 दिन छुट्टी मिलने से हम अपने अस्तित्व को तलाश सकते हैं? क्या हम अपना तीसरा घर तलाश सकते हैं? अपना काम शुरू करने से सब ठीक हो जाएगा? ऐसे ही कई सवाल है जो हर औरत के मन में आता होगा कहीं ना कहीं लेकिन वह इन सवालों को अनदेखा कर देती हैं क्युकि वे अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीती है और अपना पूरा जीवन किसी दूसरे की खुशी में समर्पण कर देती है। लेकिन ऐसा कब तक करेंगी। कभी ना कभी तो इन सभी सवालों के जवाब उन्हें ढूंढने पड़ेंगे। इन सभी रिश्तो जिम्मेदारियों के अलावा वास्तव में क्या है एक औरत की पहचान?


"एक औरत की पहचान केवल उसके रिश्तों से नहीं होती। वह अपने सपनों, अपने विचारों, अपनी इच्छाओं और अपने अस्तित्व से भी पहचानी जाती है। परिवार उसके जीवन का हिस्सा है, लेकिन उसकी पूरी पहचान नहीं। जब वह स्वयं को समझना और अपने लिए जीना सीख जाती है, तभी उसे अपना 'तीसरा घर' मिलता है वह घर जो उसके भीतर बसता है।"


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